स्तोत्र
श्री हरि शरणाष्टकम् (Shri Hari Sharanashtakam in Hindi) - संपूर्ण पाठ, महत्व, लाभ व विधि
श्री हरि शरणाष्टकम् हरि शरणाष्टकम् से जुड़ा लोकप्रिय अष्टकम पाठ है।
श्री हरि शरणाष्टकम् हरि शरणाष्टकम् की स्तुति, स्मरण और साधना में पढ़ा जाने वाला महत्वपूर्ण अष्टकम पाठ है।
इसे विशेष रूप से दैनिक पाठ तथा विशेष साधना के अवसर पर श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।
यह श्री हरि शरणाष्टकम् भक्ति और शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। पारंपरिक पाठों में क्षेत्रीय पाठांतर, उच्चारण या पंक्ति-विन्यास का अंतर मिल सकता है। श्री हरि शरणाष्टकम् के मूल पारंपरिक स्रोतों पर Hindi Chalisa स्वामित्व का दावा नहीं करता। यदि आपको किसी पृष्ठ में पाठांतर या त्रुटि दिखे तो हमें सूचित करें और विस्तृत नीति के लिए Disclaimer देखें।
विषय सूची
श्री हरि शरणाष्टकम् (संपूर्ण पाठ)
॥ श्री हरि शरणाष्टकम् ॥
ध्येयं वदन्ति शिवमेव हि केचिदन्ये शक्तिं गणेशमपरे तु दिवाकरं वै।
रूपैस्तु तैरपि विभासि यतस्त्वमेव तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥1॥
नो सोदरो न जनको जननी न जाया नैवात्मजो न च कुलं विपुलं बलं वा।
संदृष्यते न किल कोऽपि सहायको मे तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥2॥
नोपासिता मदमपास्य मया महान्तस्तीर्थानि चास्तिकधिया न हि सेवितानि।
देवार्चनं च विधिवन्न कृतं कदापि तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥3॥
दुर्वासना मम सदा परिकर्षयन्ति चित्तं शरीरमपि रोगगणा दहन्ति।
सञ्जीवनं च परहस्तगतं सदैव तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥4॥
पूर्वं कृतानि दुरितानि मया तु यानि स्मृत्वाखिलानि ह्रदयं परिकम्पते मे।
ख्याता च ते पतितपावनता तु यस्मात् तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥5॥
दुःखं जराजननजं विविधाश्च रोगाः काकश्वसूकरजनिर्निरय च पातः।
त्वद्विस्मॄतेः फलमिदं विततं हि लोके तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥6॥
नीचोऽपि पापवलितोऽपि विनिन्दितोऽपि ब्रूयात्तवाहमिति यस्तु किलैकवारम्।
तं यच्छसीश निजलोकमिति व्रतं ते तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥7॥
वेदेषु धर्मवचनेषु तथागमेषु रामायणेऽपि च पुराणकदम्बके वा।
सर्वत्र सर्वविधिना गदितस्त्वमेव तस्मात्त्वमेव शरणं मम दीनबन्धो॥8॥
॥ इति श्रीमत्परमहंसस्वामिब्रह्मानन्दविरचितं श्रीहरिशरणाष्टकं सम्पूर्णम् ॥
श्री हरि शरणाष्टकम् का महत्व
श्री हरि शरणाष्टकम् हरि शरणाष्टकम् से जुड़ा लोकप्रिय अष्टकम पाठ है।
श्री हरि शरणाष्टकम् का पाठ भक्त को स्मरण, विनम्रता, भक्ति और आध्यात्मिक एकाग्रता की ओर ले जाता है। यह पाठ हरि शरणाष्टकम् के गुणों और कृपा का चिंतन करने का माध्यम है।
- दैनिक जप या विशेष उपासना में शामिल किया जा सकता है।
- चालीसा, आरती या मंत्र जप के साथ भी पढ़ा जा सकता है।
- मन को स्थिर करने और भक्ति को गहरा करने में उपयोगी माना जाता है।
श्री हरि शरणाष्टकम् पाठ के लाभ
आध्यात्मिक लाभ
- भक्ति और साधना में नियमितता आती है।
- हरि शरणाष्टकम् के प्रति श्रद्धा और भाव बढ़ता है।
- मन में शांति और प्रार्थना का भाव गहरा होता है।
मानसिक लाभ
- एकाग्रता बढ़ती है और मन भटकाव से दूर रहता है।
- नियमित पाठ तनाव और बेचैनी को कम करने में सहायक होता है।
- सकारात्मक सोच और धैर्य को बल मिलता है।
साधना संबंधी लाभ
- व्रत, उपासना और विशेष पूजा में यह पाठ पूरक भूमिका निभाता है।
- पारिवारिक पाठ में इसे सरल रूप से शामिल किया जा सकता है।
श्री हरि शरणाष्टकम् पाठ विधि
श्री हरि शरणाष्टकम् का पाठ स्वच्छ स्थान, शांत मन और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए।
1. समय
- दैनिक पाठ के दिन इसका पाठ विशेष रूप से किया जा सकता है।
- विशेष साधना के अवसर पर इसका महत्व और बढ़ जाता है।
- प्रातःकाल या संध्याकाल दोनों समय यह पाठ उपयुक्त है।
2. तैयारी
- स्वच्छ स्थान पर दीपक या जल रखें।
- इष्ट देव की छवि या प्रतिमा के सामने बैठें।
- यदि चाहें तो हरि शरणाष्टकम् स्मरण मंत्र का स्मरण कर पाठ आरंभ करें।
3. पाठ के बाद
- कुछ क्षण मौन बैठकर प्रार्थना करें।
- संबंधित आरती या छोटा मंत्र जप किया जा सकता है।
श्री हरि शरणाष्टकम् से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
श्री हरि शरणाष्टकम् कब पढ़ना चाहिए?
श्री हरि शरणाष्टकम् का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
क्या श्री हरि शरणाष्टकम् घर पर पढ़ा जा सकता है?
श्री हरि शरणाष्टकम् पढ़ने से पहले क्या तैयारी करनी चाहिए?
निष्कर्ष
श्री हरि शरणाष्टकम् का नियमित और श्रद्धापूर्ण पाठ साधना को व्यवस्थित, मन को शांत और भक्ति को स्थिर बनाने में सहायक होता है।