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श्री नृसिंह कवचम् (Shri Narasimha Kavacham in Hindi) - संपूर्ण पाठ, महत्व, लाभ व विधि

श्री नृसिंह कवचम् नृसिंह से जुड़ा लोकप्रिय कवच पाठ है।

श्री नृसिंह कवचम् नृसिंह की स्तुति, स्मरण और साधना में पढ़ा जाने वाला महत्वपूर्ण कवच पाठ है।

इसे विशेष रूप से गुरुवार तथा एकादशी के अवसर पर श्रद्धा के साथ पढ़ा जाता है।

पाठ संबंधी सूचना

यह श्री नृसिंह कवचम् भक्ति और शैक्षिक उद्देश्य से प्रस्तुत किया गया है। पारंपरिक पाठों में क्षेत्रीय पाठांतर, उच्चारण या पंक्ति-विन्यास का अंतर मिल सकता है। श्री नृसिंह कवचम् के मूल पारंपरिक स्रोतों पर Hindi Chalisa स्वामित्व का दावा नहीं करता। यदि आपको किसी पृष्ठ में पाठांतर या त्रुटि दिखे तो हमें सूचित करें और विस्तृत नीति के लिए Disclaimer देखें।

विषय सूची

  1. श्री नृसिंह कवचम् (संपूर्ण पाठ)
  2. श्री नृसिंह कवचम् का महत्व
  3. श्री नृसिंह कवचम् पाठ के लाभ
  4. श्री नृसिंह कवचम् पाठ विधि
  5. अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
  6. निष्कर्ष
  7. अन्य स्तोत्र

श्री नृसिंह कवचम् (संपूर्ण पाठ)

॥ अथ श्री नृसिंहकवचम् ॥

नृसिंहकवचं वक्ष्ये प्रह्लादेनोदितं पुरा।

सर्वरक्षाकरं पुण्यं सर्वोपद्रवनाशनम्॥1॥

सर्व सम्पत्करं चैव स्वर्गमोक्षप्रदायकम्।

ध्यात्वा नृसिंहं देवेशं हेमसिंहासनस्थितम्॥2॥

विवृतास्यं त्रिनयनं शरदिन्दुसमप्रभम्।

लक्ष्म्यालिङ्गितवामाङ्गं विभूतिभिरुपाश्रितम्॥3॥

चतुर्भुजं कोमलाङ्गं स्वर्णकुण्डलशोभितम्।

सरोजशोभितोरस्कं रत्नकेयूरमुद्रितम्॥4॥

तप्तकाञ्चनसंकाशं पीतनिर्मलवाससम्।

इन्द्रादिसुरमौलिस्थ - स्फुरन्माणिक्यदीप्तिभिः॥5॥

विराजितपदद्वन्द्वं शङ्खचक्रादि हेतिभिः।

गरुत्मता च विनयात् स्तूयमानं मुदान्वितम्॥6॥

स्वहृत्कमलसंवासं कृत्वा तु कवचं पठेत्।

नृसिंहो मे शिरः पातु लोकरक्षार्थसम्भवः॥7॥

सर्वगोऽपि स्तम्भवासः भालं मे रक्षतु ध्वनिम्।

नृसिंहो मे दृशौ पातु सोमसूर्याग्निलोचनः॥8॥

स्मृतिं मे पातु नृहरिर्मुनिवर्यस्तुतिप्रियः।

नासं मे सिंहनासस्तु मुखं लक्ष्मीमुखप्रियः॥9॥

सर्वविद्याधिपः पातु नृसिंहो रसनां मम।

वक्त्रं पात्विन्दुवदनं सदा प्रह्लादवन्दितः॥10॥

नृसिंहः पातु मे कण्ठं स्कन्धौ भूभरान्तकृत्।

दिव्यास्त्रशोभितभुजो नृसिंहः पातु मे भुजौ॥11॥

करौ मे देववरदो नृसिंहः पातु सर्वतः।

हृदयं योगिसाध्यश्च निवासं पातु मे हरिः॥12॥

मध्यं पातु हिरण्याक्षवक्षःकुक्षिविदारणः।

नाभिं मे पातु नृहरिः स्वनाभि ब्रह्मसंस्तुतः॥13॥

ब्रह्माण्डकोटयः कट्यां यस्यासौ पातु मे कटिम्।

गुह्यं मे पातु गुह्यानां मन्त्राणां गुह्यरूपदृक्॥14॥

ऊरु मनोभवः पातु जानुनी नररूपधृक्।

जङ्घे पातु धराभारहर्ता योऽसौ नृकेसरी॥15॥

सुरराज्यप्रदः पातु पादौ मे नृहरीश्वरः।

सहस्रशीर्षा पुरुषः पातु मे सर्वशस्तनुम्॥16॥

महोग्रः पूर्वतः पातु महावीराग्रजोऽग्नितः।

महाविष्णुर्दक्षिणे तु महाज्वालस्तु नैरृतौ॥17॥

पश्चिमे पातु सर्वेशो दिशि मे सर्वतोमुखः।

नृसिंहः पातु वायव्यां सौम्यां भीषणविग्रहः॥18॥

ईशान्यां पातु भद्रो मे सर्वमङ्गलदायकः।

संसारभयतः पातु मृत्योर्मृत्युर्नृकेसरी॥19॥

॥ फल श्रुति ॥

इदं नृसिंहकवचं प्रह्लादमुखमण्डितम्।

भक्तिमान् यः पठेन्नित्यं सर्वपापैः प्रमुच्यते॥20॥

पुत्रवान् धनवान् लोके दीर्घायुरुपजायते।

यं यं कामयते कामं तं तं प्राप्नोत्यसंशयम्॥21॥

सर्वत्र जयमाप्नोति सर्वत्र विजयी भवेत्।

भूम्यन्तरीक्षदिव्यानां ग्रहाणां विनिवारणम्॥22॥

वृश्चिकोरगसम्भूत विषापहरणं परम्।

ब्रह्मराक्षसयक्षाणां दूरोत्सारणकारणम्॥23॥

भूर्जे वा तालपत्रे वा कवचं लिखितं शुभम्।

करमूले धृतं येन सिध्येयुः कर्मसिद्धयः॥24॥

देवासुरमनुष्येषु स्वं स्वमेव जयं लभेत्।

एकसन्ध्यं त्रिसन्ध्यं वा यः पठेन्नियतो नरः॥25॥

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं भुक्तिं मुक्तिं च विन्दति।

द्वात्रिंशतिसहस्राणि पठेत् शुद्धात्मनां नृणाम्॥26॥

कवचस्यास्य मन्त्रस्य मन्त्रसिद्धिः प्रजायते।

अनेन मन्त्रराजेन कृत्वा भस्माभिमन्त्रणम्॥27॥

तिलकं विन्यसेद्यस्तु तस्य ग्रहभयं हरेत्।

त्रिवारं जपमानस्तु दत्तं वार्यभिमन्त्र्य च॥28॥

प्राशयेद्यो नरो मन्त्रं नृसिंहध्यानमाचरेत्।

तस्य रोगाः प्रणश्यन्ति ये च स्युः कुक्षिसम्भवाः॥29॥

किमत्र बहुनोक्तेन नृसिंहसदृशो भवेत्।

मनसा चिन्तितं यत्तु स तच्चाप्नोत्यसंशयम्॥30॥

गर्जन्तं गर्जयन्तं निजभुजपटलं स्फोटयन्तं हठन्तं

रूप्यन्तं तापयन्तं दिवि भुवि दितिजं क्षेपयन्तं क्षिपन्तम्।

क्रन्दन्तं रोषयन्तं दिशि दिशि सततं संहरन्तं भरन्तं

वीक्षन्तं घूर्णयन्तं शरनिकरशतैर्दिव्यसिंहं नमामि॥31॥

॥ इति श्रीब्रह्माण्डपुराणे नारदागस्तिसंवादे प्रह्लादप्रोक्तं

श्रीनृसिंहकवचं अथवा श्रीलक्ष्मीनृसिंहकवचं सम्पूर्णमस्तु ॥

श्री नृसिंह कवचम् का महत्व

श्री नृसिंह कवचम् नृसिंह से जुड़ा लोकप्रिय कवच पाठ है।

श्री नृसिंह कवचम् का पाठ भक्त को स्मरण, विनम्रता, भक्ति और आध्यात्मिक एकाग्रता की ओर ले जाता है। यह पाठ नृसिंह के गुणों और कृपा का चिंतन करने का माध्यम है।

साधना में उपयोग
  • दैनिक जप या विशेष उपासना में शामिल किया जा सकता है।
  • चालीसा, आरती या मंत्र जप के साथ भी पढ़ा जा सकता है।
  • मन को स्थिर करने और भक्ति को गहरा करने में उपयोगी माना जाता है।

श्री नृसिंह कवचम् पाठ के लाभ

आध्यात्मिक लाभ

  • भक्ति और साधना में नियमितता आती है।
  • नृसिंह के प्रति श्रद्धा और भाव बढ़ता है।
  • मन में शांति और प्रार्थना का भाव गहरा होता है।

मानसिक लाभ

  • एकाग्रता बढ़ती है और मन भटकाव से दूर रहता है।
  • नियमित पाठ तनाव और बेचैनी को कम करने में सहायक होता है।
  • सकारात्मक सोच और धैर्य को बल मिलता है।

साधना संबंधी लाभ

  • व्रत, उपासना और विशेष पूजा में यह पाठ पूरक भूमिका निभाता है।
  • पारिवारिक पाठ में इसे सरल रूप से शामिल किया जा सकता है।

श्री नृसिंह कवचम् पाठ विधि

श्री नृसिंह कवचम् का पाठ स्वच्छ स्थान, शांत मन और श्रद्धा के साथ किया जाना चाहिए।

1. समय

  • गुरुवार के दिन इसका पाठ विशेष रूप से किया जा सकता है।
  • एकादशी के अवसर पर इसका महत्व और बढ़ जाता है।
  • प्रातःकाल या संध्याकाल दोनों समय यह पाठ उपयुक्त है।

2. तैयारी

  • स्वच्छ स्थान पर दीपक या जल रखें।
  • इष्ट देव की छवि या प्रतिमा के सामने बैठें।
  • यदि चाहें तो ॐ नमो नारायणाय का स्मरण कर पाठ आरंभ करें।

3. पाठ के बाद

  • कुछ क्षण मौन बैठकर प्रार्थना करें।
  • संबंधित आरती या छोटा मंत्र जप किया जा सकता है।

श्री नृसिंह कवचम् से जुड़े अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

श्री नृसिंह कवचम् कब पढ़ना चाहिए?
श्री नृसिंह कवचम् का पाठ गुरुवार तथा एकादशी के समय श्रद्धा और एकाग्रता के साथ किया जा सकता है।
श्री नृसिंह कवचम् का पाठ करने से क्या लाभ होते हैं?
श्री नृसिंह कवचम् का नियमित पाठ मन को स्थिरता, भक्ति, सकारात्मकता और साधना में निरंतरता देता है।
क्या श्री नृसिंह कवचम् घर पर पढ़ा जा सकता है?
हाँ, श्री नृसिंह कवचम् घर, मंदिर या व्यक्तिगत साधना के समय शुद्ध मन और शांत वातावरण में पढ़ा जा सकता है।
श्री नृसिंह कवचम् पढ़ने से पहले क्या तैयारी करनी चाहिए?
स्वच्छ स्थान, शांत मन, दीपक या जल, और यदि संभव हो तो इष्ट देव की छवि के सामने बैठकर पाठ करना अधिक श्रेयस्कर माना जाता है।

निष्कर्ष

श्री नृसिंह कवचम् का नियमित और श्रद्धापूर्ण पाठ साधना को व्यवस्थित, मन को शांत और भक्ति को स्थिर बनाने में सहायक होता है।

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